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रोगी के मन को समझना भी चिकित्सा का अहम हिस्सा : डॉ. द्विवेदी
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर BHMS विद्यार्थियों को मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, मानसिक लक्षणों और संवेदनशील चिकित्सा का महत्व बताया
इंदौर, 10 अक्टूबर। “एक अच्छे चिकित्सक के लिए रोग की पहचान करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोगी की भावनाओं, व्यवहार और मानसिक स्थिति को समझना भी उतना ही आवश्यक है।” यह बात एस.के.आर.पी. गुजराती होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, इंदौर के मानव शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. ए.के. द्विवेदी ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर आयोजित शैक्षणिक कार्यक्रम में कही। कार्यक्रम में BHMS प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया गया।
डॉ. द्विवेदी ने मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स तथा Brodmann Areas 9, 10 और 11 तथा 12 की भूमिका समझाते हुए बताया कि तर्कशक्ति, कार्यशील स्मृति, योजना बनाने और निर्णय लेने जैसी जटिल प्रक्रियाओं में मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्र आपसी समन्वय से कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य केवल मानसिक बीमारी की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि व्यक्ति की सोचने, सीखने, भावनाओं को संतुलित करने, संबंध बनाए रखने और दैनिक चुनौतियों का सामना करने की क्षमता से भी जुड़ा है।
होम्योपैथी में मानसिक लक्षणों का विशेष महत्व
डॉ. द्विवेदी ने बताया कि होम्योपैथी की परंपरागत केस-टेकिंग पद्धति में रोगी के मानसिक एवं भावनात्मक लक्षणों, व्यवहार, भय, तनाव, चिड़चिड़ेपन, नींद और व्यक्तिगत अनुभवों को विस्तार से दर्ज किया जाता है। चिकित्सक को केवल रोग के नाम तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रोगी की संपूर्ण परिस्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिए। मानसिक लक्षणों का मूल्यांकन करते समय रोगी का इतिहास, शारीरिक लक्षण, वैज्ञानिक जानकारी और आवश्यक नैदानिक परीक्षणों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पारिवारिक तनाव, पति-पत्नी के बीच मतभेद, बच्चों में आक्रामक व्यवहार, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और अवसाद जैसी परिस्थितियों में संवेदनशील संवाद तथा समय पर पेशेवर सहायता महत्वपूर्ण है। चिकित्सक की भूमिका रोगी की बात ध्यानपूर्वक सुनने, उसकी स्थिति का उचित आकलन करने और जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक या अन्य संबंधित विशेषज्ञ के पास भेजने में भी अहम होती है।
बच्चों के व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज न करें
कार्यक्रम में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD), अटेंशन-डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD), अवसाद और अनिद्रा जैसी स्थितियों पर भी चर्चा हुई। डॉ. द्विवेदी ने कहा कि बच्चों में लगातार आक्रामकता, अत्यधिक चंचलता या ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई को केवल अनुशासन की कमी नहीं समझना चाहिए। समय पर पहचान, उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन, परिवार का सहयोग और प्रमाण-आधारित उपचार आवश्यक हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इन स्थितियों में होम्योपैथिक औषधियों की प्रभावशीलता के पर्याप्त उच्च-गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए होम्योपैथी को प्रमाण-आधारित उपचार या आवश्यक विशेषज्ञ चिकित्सा का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
इस वर्ष विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की थीम “Lived Experiences Heard: Real Voices, Real Change” है, जिसका आशय है—“अनुभवों की आवाज सुनें: वास्तविक आवाजें, वास्तविक बदलाव।” इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का व्यक्तिगत अनुभव रखने वाले लोगों की बात को महत्व देना तथा उनकी भागीदारी से स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक संवेदनशील और सुलभ बनाना है।
डॉ. द्विवेदी ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे भविष्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवीय संवेदनशीलता के साथ चिकित्सा सेवा प्रदान करें। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कलंक और भेदभाव को दूर करना तथा जरूरतमंदों को उचित सहायता उपलब्ध कराना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।


